खिलखिलाएगा बचपन , जब झारखंड के हर बच्चे को मिलेगा पोषण

कहा जाता है कि बच्चे स्वस्थ होंगे तो समाज स्वस्थ होगा । और बच्चों के स्वस्थ होने के लिए उनको पोषण जरूरी है । दुर्भाग्य से झारखंड कुपोषण और एनीमिया लगातार जूझता रहा की समस्या से है । हाल के वर्षों में इसमें सुधार हुआ है , लेकिन पोषण से संबंधित आंकड़े अभी भी काफी चिंताजनक है , क्योंकि बच्चों के कुपोषित होने का असर उनके मानसिक विकास पर पड़ता है । राष्ट्रीय शिक्षा नीति -2020 में भी कहा गया है कि बच्चे कुपोषित होते हैं तो वे बेहतर रूप से सीखने में असमर्थ हो जाते हैं । नीति में बच्चों के पोषण और स्वास्थ्य पर विशेष जोर दिया गया है । 

राज्य में कुपोषण दूर करने के लिए राज्य सरकार कई कार्यक्रम संचालित कर रही है । केंद्र को भी कई योजनाएं चल रही है । इनमें पूरक पोषाहार प्रमुख हैं । बच्चों के पोषण के लिए राज्य सरकार अपने संसाधनों से भी चीन से से छ वर्ष तक के बच्चों को पोषाहार आंगनवाड़ी केंद्रों पर पूरक कार्यक्रम के अतिरिक्त बच्चों की अंडा एवं अन्य बच्चों को समकक्ष 1 प्रोटीनयुक्त भोजन देने पर विचार कर रही है । इसके लिए हाल ही में सीएम हमत सोरेन ने केंद्र से अनुशंसित 312 करोड़ रुपये की राशि विमुक्त करने की मांग की है । यह राशि 15 वें वित्त आयोग द्वारा कुपोषण के खिलाफ लड़ाई के लिए 2020-21 में ही झारखंड के लिए आवंटित की गई थी । वहीं , राज्य में साझा पोषण योजना शुरू करने की तैयारी है । दरअसल , सुपोषित किशोरी स्वस्थ जच्चा - बच्चा का आधार होता है । इस योजना के माध्यम से किशोरियों एवं नवयुवतियों को पोषण सहायता उपलब्ध कराकर कुपोषण के चक्र को तोड़ने का प्रयास किया जाएगा । इस साल 15 लाख किशोरियों को इस योजना से जोड़ने का लक्ष्य है । 

कोरोना से बचाने की चुनौती 

झारखंड में लगभग 48 % बच्चे कुपोषित है इनमें बड़ी संख्या अति कुपोधित ( सैम ) बच्चों की है । कोरोना की संभावित तीसरी लहर के B Hibs ( 54 उनका आने पर इन बच्चों के प्रभावित होने का खतरा अधिक हो सकता है । यह भी संभावना जताई जा रही है कि कोरोना के कारण ऐसे बच्चों की संख्या बढ़ सकती है । इसे देखते हु अति कुपोषित बच्चों की पहचान कर उपकरवचन उपचार उचित प्रबंधन जरूरी है । स्वास्थ्य से संबंधित सबसे प्रतिष्ठित पत्रिका लैसेट द्वारा जुलाई , 2020 में आकलन किया गया कि कोरोना के कारण मध्यम एवं अति गंभीर कुपोषित बच्चों की संख्या में 14.3 % की वृद्धि हो सकती है । अति गंभीर गंभीर कुपोषि बच्चों में बार बार बीमार होने एवं संक्रमण का खतरा बना रहता है । इससे मृत्यु का जोखिम भी बढ़ जाता कुपोषित बच्चों की निगरानी की आवश्यकता इसलिए भी है क्योंकि अति गंभीर रूप से कपोषित बच्चों में से एवं 10 से 15 % बच्चों में ही कम भूख या चिकित्सीय जटिलताएं होती है जिन्हें कुपोषण उपचार केंद्रों में भर्ती करने की आवश्यकता होती है। 85 से 90 % बच्चों का प्रबंधन घर पर ही विशिष्ट उपचार, आहार तथा सही परामर्श देकर किया जा सकता है । 

लड़ाई के लिए राज्य के आंगनबाड़ी केंद्रों को माडल के रूप में विकसित किया जा रहा हैं । इनमें उन्हें मुन्ने के लिए कई सुविधाएं विकसित की जा रही है , जिनमें खेल की सुविचार भी शामिल है । केंद्रों को सुंदर ढंग से सजाया भी जा रहा है कि बच्चे हो सके । इस क्रम में और माझी के मुद्रा स्थित आगनबाड़ी केंद्र को इस रूप में विकसित किया गया है । 

मिड डे मील को और करना होगा दुरुस्त 

केंद्र सरकार के सहयोग से संचालित मिड डे मील योजना ( पीएम पोषण योजना ) का उद्देश्य बच्चों में पोषण सुनिश्चित करना भी है । राज्य में इस महत्वाकांक्षी योजना को और दुरुस्त करने की जरूरत है । राष्ट्रीय शिक्षा नीति में बच्चों को मिड डे मील के अलावा ब्रेकफास्ट देने की बात कही गई है । झारखंड में भी इसे शीघ्र लागू करने की जरूरत है ।
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